दशहरा पर्व से जुड़े कुछ रोचक तथ्य

,जो आप नहीं जानते होंगे शायद

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Information : दुशेरा जो इक भारत का खास त्यौहार है जो की खूब हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता है. यह त्यौहार बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतिक है, जो की हमे यह सिखाता है की चाहे कोई भी कठिन से कठिन परिस्थिति आ जाये, चाहे बुराई का कितना भी बोल वाला हो, अच्छाई कभी भी दब नहीं सकती.

लेकिन क्या आप जानते है की इस त्यौहार के साथ जुड़ी हुई कुछ और भी रोचक बातें जो की कम लोग ही जानते है. तो आयें हम आपको बताते है. ऐसा माना जाता है की दुशेरा मानाने की शुरुआत 17. वी सदी में मैसूर के राजा वोडेयार ने भव्य आयोजन के साथ की थी. तब से लेकर अब तक हर साल दुशेरा मनाया जाने लगा. और आज की तारीख में मैसूर में विश्व प्रसिद्ध दशहरा का भव्य जुलुस निकलता है | इसमें हाथी पर महाराजा , विशेष पोशाक में दरबारी , घोड़े ,ऊंट और अपार जनसमूह के साथ साथ मैसूर की प्रगति दिखाने वाली झांकिया शामिल होती है | यहा रावण का पुतला जलाने की परम्परा नही है | वैसे देखा जाए तो यह त्यौहार प्राचीन काल से चला आ रहा है |आरम्भ ने यह कृषि सम्बधी लोकोत्सव था |वर्षा ऋतू में बोई गयी धान की पहली फसल जब किसान घर ले आते थे तब यह उत्सव मनाते थे | नवरात्रि की घट स्थापना के दिन कलश के वेदी पर नौ प्रकार के अनाज बोते है एवं दशहरे के दिन अंकुरों को निकालकर देवता को चढाते है  दुशेरा संस्करित शब्द से बना है, दशः हारा, जिसका अर्थ यह है की सूरज तब तक नहीं उदय होगा जब तक भगवन राम रावण का वध नहीं कर देते.   दशहरा को विजयदशमी  के नाम से भी जाना जाता है. जिसका अर्थ होता है दसवें दिन का विजय. इसका महत्‍व इस रूप में भी होता कि मां दुर्गा ने दसवें दिन महिषासुर राक्षस का वध किया था जहाँ उत्तर भारत में दुशेरा के दिन रावण के साथ उसके साथ लगे दस सर जलाये जाते है जो की दस बुराई का प्रतिक है. क्रोध, मोहा, लोभ, स्वार्थ , अभिमानता ,हवस, मत्सरा अहंकार ,अमानवता अन्याय. वहीँ पूर्व भारत में माँ दुर्गा की प्रतिमा जो पानी में विसर्जित किया जाता है जो की उनके घर वापिस जाने का प्रतिक है. काशी-वाराणसी में विजयादशमी पर शस्त्र पूजन , नीलकंठ दर्शन और शमी वृक्ष पूजन की परम्परा है  दक्षिण भारत में इन दिनों कोलूं पर्व मनाने की परम्परा अहि . इसमें विशेष सीढ़ी पर खिलौनों को सुरुचिपूर्ण ढंग से सजाने की परम्परा है. तमिलनाडू में इन दिनों आदिशक्ति पूजन की परम्परा है. क्यूंकि माना यह भी जाता है की माँ दुर्गा अपने पुत्र कार्तिकेय और गणेश के साथ कुछ दिन के लिए पृथ्वी पर ठहरने के लिए आते है और दुशरे वाले दिन भगवान शंकर के पास अपने लोक वापिस चले जाते है, इसलिए इस दिन यात्रा करना भी शुभ माना जाता है. दुशेरा न सिर्फ भारत में मनाया जाता है बल्की नेपाल, भूटान और मलेशिया में भी मनाया जाता है. दुशेरा का ही वो पावन दिन था जान सम्राट अशोक के बोध धरम को अपनाया था. और डॉ. आंबेडकर ने भी इसी दिन बोध धरम को अपनाया था. इस त्योहार को मौसम बदलने से भी जोड़कर देखा जाता है, इस दिन के बाद से सर्दियों की शुरुआत होती है. बता दें कि यह खरीफ की खेती का मौसम होता है.

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