शनि देव ने जब अपनी ही माता को दिया उनके कर्मो का फल

,अष्व बन कर रहना पड़ा पृथ्वी पर

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Information : वैसे तो हिन्दू धर्म में बोहोट सी कथाये लोकप्रिय है इनमे से ही एक कथा कर्म फल दाता शनि देव की है . शनि देव का सृजन त्रिदेव यानि ब्रम्हा विष्णु और महेश ने इस संसार में संतुलन बनाये रखने के लिए किया था . न्याय के रस्ते पर चलते हुए शनि देव ने हमेशा सबको उनके कर्मो के अनुसार ही फल दिया है पर क्या आप जानते है शनि देव ने न्याय करने के लिए अपनी माता पर भी वक्र द्रिष्टि डाली थी जी हा जैसा के आप जानते है शनि देव की माता का सृजन सूर्य देव की पत्नी देवी संज्ञा ने अपनी छाया से किया था इस नाते देवी संज्ञा भी उनकी माता ही हुई क्यों के उनमे देवी संज्ञा का अंश था

देवी संज्ञा ने देवी छाया का सृजन इसलिए किया था क्यों के वो सूर्य देव का तप सेहन नहीं कर पाती थी और उनके स्पर्श से जल जाती थी इसी लिए उन्होंने तप करने का निश्चय किया और अपने पीछे से अपनी सन्तानो यम और यमी की देखभाल और अपने पती सूर्य देव की सेवा के लिए अपनी छाया से देवी छाया का निर्माण किया पर जब वो तप कर के वापिस आयी तो उन्हें देवी छाया और सूर्य पुत्र शनि के बारे में पता चला तो वो बोहोट क्रोधित हो गयी . सूर्य देव को देवी संज्ञा के इस छल के बारे में पता नहीं था वो इतने वर्षो तक देवी छाया को संज्ञा ही समझते रहे . देवी संज्ञा ने देवी छाया और शनि देव को कभी नहीं अपनाया और हमेशा उनका अंत करने के कई प्रयास किये . जबउनके पापो का घड़ा भर गया तो उन्हें दंड देने के लिए शनि देव ने उनपे वक्र द्रिष्टि डाली और प्रुथ्वी लोक पर भेज दिया वहा देवी संज्ञा ने शनि देव पर प्रहार किया शनि देव तो उस प्रहार से बच गए पर पीछे तप कर रहे ऋषि को वो प्रहार लग गया क्रोध में आ कर ऋषि ने देवी संज्ञा को अष्व बन जाने का श्राप दिया . इस तरह शनि देव की वक्र द्रिष्टि की वजह से देवी संज्ञा को उनके पापो का फल मिला .

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