शनि देव के जन्म की गाथा

,जन्म लेते ही पिता से जब मिला श्राप

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Information : शनि देव के सृजन की कथा भी उतनी ही भिन है जितने खुद शनि देव बाकि देवो से भिन है शनि देव सूर्य देव की संतान है और उनकी प्रथम पत्नी देवी संज्ञा द्वारा उनकी ही छाया से सृजित की गयी देवी छाया शनि देव की माता है .

जब शनि देव का जन्म हुआ तो शनि देव का रंग रूप देख कर सूर्य देव ने उन्हें अपनी संतान मानने से इंकार कर दिया और शनि देव का अपमान किया ये कह कर के ऐसा तेज़ हिन् बालक उनकी संतान नहीं हो सकता . शनि देव ने जन्म लेते ही सूर्य देव को उनके कर्मो का फल देते हुए . उन्हें ग्रहण लगा दिया .जिससे रुष्ट हो कर शनि देव को सूर्य देव ने त्याग दिया और उन्हें शार्प भी दिया . अपने जीवन के 10 साल शनि देव ने वन में बाकि संसार से दूर माता छाया संग बिताये उस दौरान माता शनि देव का सूर्य देव से छुप छुप कर पालन पोषण करती रही . उन्होंने पत्नी धर्म भी निभाया और मात्र धरम भी . शनि देव जो हर मनुष्य देवता दानव यक्ष और गन्धर्वो को उनके कर्मो के अनुसार फल देते है समय आने पर कर्म फल दाता बन कर कर्मो का फल देते है और अगर फिर भी कोई सही मार्ग पर न आये तो ये दंड नायक शनि का रूप ले कर दंड भी देते है . शनि देव की वक्र दृष्टि से भला कौन बच पाया . वक्र दृष्टि का मतलब ये नहीं के ये सिर्फ दंड देने क लिए ही है . ये मनुष्य के कर्मो का फल उसके कर्मो के अनुसार निर्धारित करती है . अच्छे कर्म करने वाला इंसान हमेशा यश वैभव का पात्र बनता और बुर्रे कर्म करने वाले इंसान का दंड शनि देव कर्मो के आधार पे निर्धारित करते है .पर कलयुग में मनुष्य द्वारा किये जा रहे पापो के कारन सबकी मानसिकता शनि देव के प्रति दंड नायक की बन चुकी है . ग्रहों की शांति के लिए शनि देव को कड़वा तेल, तिल, माह चढ़ाये जाते है . पोस्ट अछि लगे तो शेयर और लाइक जरूर करे

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