ज्वालाजी मंदिर की कथा

,जब अकबर भी हुआ माता के सामने नत मस्तक

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Information : देव भूमि हिमांचल में जवालाजी माता का मंदिर जिसकी गिनती माता सती के शक्ति पीठो में होती है . कहते है के यहाँ माता की जीभ गिरी थी . जवाला जी को नगरकोट के नाम से भी जाना जाता ये काँगड़ा से 30 किलोमीटर दूर है . यहाँ पोहोंचने के लिए हवाई , सड़क और रेल मार्ग उपलब्ध है . रेल मार्ग पठानकोट से शुरू होता और हवाई मार्ग के लिए गगल एयरपोर्ट पे उतरना पड़ा जो की यहाँ से 40 किलोमीटर दूर है . और सड़क मार्ग चंडीगड़ और पठानकोट दोनों से उपलब्ध है . कहते हे एक बार ध्यानु भगत माता के दर्शन के लिए निकला उसने अपने साथ और लोगो को भी चलने को कहा तीर्थ सथल होने के कारन माता के दर्शन के लिए बोहोत से श्रद्धालु ध्यान भगत के साथ चल पड़े . रस्ते में दिल्ली से निकलते हुए बादशा अकबर के सिपाहियों ने उन्हें रोक लिया और और घोड़ो के साथ बादशा के सामने पेश कर दिया . बादशा के पोछे पर ध्यानु भगत ने बताया के सुब श्रद्धालु हे और माता के दर्शन के लिए उत्तर दिशा की तरफ जा रहे हे . बादशा ने कहा ये कोण माता है ध्यानु ने माता का गुणगान किया . बादशा ने उसने सिपाहियों को घोड़ो की गर्दन काटने को बोला गर्दन काटने के बाद बादशा ने कहा ध्यानु से कहा अगर तुम्हारी माता सच्ची है और वो अपने भगतों का ध्यान रखती है तो इन घोड़ो को जिन्दा करने को बोलो अपनी माता को . ध्यानु ने अकबर से एक महीने का वक़्त माँगा और घोड़ो का शरीर संभाल के रखने को बोला . अकबर ने ध्यानु की बात मान ली और उसके बाद उसे माता के दर्शन के लिए जाने दिया . ध्यानु ने माता की पूजा अर्चन की और और जवालाजी में आ के माता से प्रार्थना की के अकबर तेरे भगत की परीक्षा ले रहा . माता रानी घोड़ो को जीवन दान दो . घोड़े दोबारा जिन्दा हो गए और ये देख अकबर बोहोत हैरान हुआ उसने सिपाहियों को जवालाजी चलने को बोला . अकबर के मान में अब भी शंका थी उसने वह पोहोंच कर सारे मंदिर में पानी फेंकवा दिया . पर जवाला वैसे ही जलती रही ये देख अकबर को भी यकीन हो गया और उसने 50 किलो सोने का छत्ततर चढ़ाया पर माता रानी ने उसे स्वीकार नहीं किया और वो निचे गिर गया और किसी और धातु का बन गया . आज भी वो छतर आप यहाँ देख सकते है . जय माता दी माता की लीला निराली है . पोस्ट अछि लगे तो शर जरूर करे

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