कर्ण और द्रोपदी की प्रेम कहानी

,कैसे हुआ दोनों की प्रेम कहानी का अंत जाने

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Information : आज हम आपको बातएंगे कर्ण और द्रोपदी की प्रेम कहानी की बारे में बातएंगे .महाभारत काल में कर्ण जैसा योद्धा इस संसार में कोई नहीं था कर्ण की वीरता के चर्चे उनदिनों चारो और थे और कर्ण की इसी वीरता के चलते राजा द्रुपद की पुत्री द्रोपदी कर्ण को मन ही मन प्रेम करने लग गयी थी और कर्ण भी द्रोपद की पुत्री द्रोपदी से प्रेम करने लग गए थे और मन ही मन उन्होंने द्रोपदी को अपनी पत्नी बनाने की थान ली थी . दोस्तों जैसे की आप जानते ही हो कर्ण कुन्ती का पुत्र था और कुन्ती को कर्ण भगवान सूर्य द्वारा प्राप्त हुआ था और उनके जन्म के समय कुन्ती का विवाह नहीं हुआ था और लोक लज्जा के चलते कुन्ती ने कर्ण को गंगा नदी में बहा दिया था सूर्य पुत्र होने की वजह से कर्ण गंगा नदी में बिना डूबे बहते चले गए बोहोत दूर एक सारथि जिसका नाम आदिरथ था अपने घोड़े को पानी पीला रहा था उसने कर्ण को देखा और उससे बचा लिया और अपने साथ ले गया और कर्ण को अपना पुत्र बना लिया बड़ा होने पर कर्ण अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए बड़े बड़े राज्यों में वार्षिक समारोह में जाया करते थे इससे कर्ण को बोहोत सा धन प्राप्त होता था ऐसे ही एक बार द्रुपद के किसी समारोह में कर्ण ने अपनी प्रतिभा दिखाई ये देख द्रोपदी कर्ण को मन ही मन प्रेम करने लग गयी

कर्ण और द्रोपदी दोनों विवाह के सपने देखने लगे . उन दिनों किसी भी राज घराने की कन्या का विवाह स्वयम्बर से होता था कर्ण जानते थे के वो स्वयम्बर जीत लेंगे और द्रोपदी का विवाह उनसे हो जायेगा इसके बाद दोनों स्वयम्बर की प्रतीक्षा करने लग गए . द्रोपदी के स्वम्बर में द्रुपद ने शर्त रखी के जो कोई खोलते तेल में देख कर मछली की आंख में निशाना लगाएगा द्रोपदी का विवाह उसी से होगा . कर्ण के लिए ये शर्त बड़ी मौली सी थी . पर जब द्रोपदी का स्वयम्बर हुआ तो कर्ण को नहीं बुलाया गया क्यों की उन दिनों किसी भी सूद पुत्र का स्वयम्बर में भाग लेना माना था और इसी प्रथा के करना दोनों की प्रेम कहानी का अंत हो गया .

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