इतिहास में नहीं मिली जगह इस महान क्रन्तिकारी को

,भुला दिया गया क़ुरबानी को

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Information : शेर अली अफरीदी एक ऐसे क्रांतिकारी थे जिनका इतिहास की किताबो में शायद ही कहीं मिले ना ही इनकी याद में कोई जयंती मनाता है और न ही देश के क्रांतिकारीयो या देशभक्तों की सूची में उनका कोई नाम है

जिस अंग्रेज अधिकारी की हत्या करने की योजना कई सारे क्रांतिकारी संघठन बना रहे थे लेकिन कामयाब नही हो रहे थे उस काम को शेर अली अफरीदी ने अकेले ही कर दिखाया था उन्होंने अंग्रेज गवर्नर जनरल लोर्ड मेयो की हत्या कर दी थी ये काम कितना मुश्किल था इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है के वर्तमान भारत में जो हैसियत प्रधानमंत्री की होती है वही हैसियत अंग्रेजी राज में गवर्नर जनरल की होती थी शेर अली पेशावर के अंग्रेजी कमिश्नर के ऑफिस में काम करते थे वे खैबर पख्तून इलाके के रहने वाले पठान थे शुरुआत में उन्हें अंग्रेजी शाशन बुरा नही लगता था देश और देश भक्ति क्या होती है इसके बारे में वो ज्याद नही सोचते थे लेकिन एक घटना ने उनके सोचने का नजरिया ही बदल दिया असल में एक झगडे में उनके उपर कत्ल का झूठा इल्जाम लगा दिया गया उसने अपने आप को कोर्ट में बेगुनाह साबित करने की जी जान से कोशिश के लेकिन उन दिनों अंग्रेजी सरकार में रंगभेद का बहुत बोलबाला था गौरे अफसर हम काले हिनुस्तानियो की बात भी नही सुनती थी बस ऐसा ही कुछ भेदभाव शेर अली के साथ भी हुआ अंग्रेजो ने बिना उनकी बात सुने सन 1867 उन्हें उमेर्कैद की सजा सुना दी और उन्हें सजा काटने काला पानी यानि अंडमान निकोबार भेज दिया गया वहां उनकी मुलाकात कई सारे सजा काट रहे क्रांतिकारियों से हुई जिसकी वजह से अंग्रेज विरोधी भावनाए मजबूत होने लगी छोटे से छोटे अंग्रेजी सैनिक को बडे से बड़े जुर्म के वाबजूद कोई सजा नहीं दी जाती थी, और उसे काला पानी भेज दिया गया था तिल तिल कर मरने के लिए। उन्होंने तय कर लिया था कि उसे दो व्यक्तियों की हत्या करनी है एक वो जो उनका सुप्रिडेंटेंट था और दूसरा अंग्रेजी राज के गवर्नर की। जेल में उसके अच्छे व्यवहार की वजह से 1871 में उसे पोर्ट ब्लेयर पर नाई का काम करने की इजाजत दे दी गई, यह एक तरह की ओपन जेल थी वहां से भागने की हिम्मत कोई नहीं कर सकता था। और कोई भाग कर जा भी कहाँ सकता है क्योकि चारो और सिर्फ समुद्र ही था सन 1871 में शेर अली को अपने मकसद को पूरा करने को मौका मिल ही गया हुआ ये के गवर्नर लोर्ड मेयो ने अचानक जेल का दौरा करने का फैसला किया वो जेल में आ धमके और कैदियों का हाल चाल जानने लगे उनका कोर सिक्योरिटी दस्ता जिसमें 12 सिक्योरिटी ऑफिसर शामिल थे, वो भी साथ साथ चल रहे थे। इधर शेर अली अफरीदी ने उस दिन तय कर लिया था कि आज अपना मिशन पूरा करना है, जिस काम के लिए वो सालों से इंतजार कर रहा था, वो मौका आज उसे मिल गया है और शायद सालों तक दोबारा नहीं मिलना है। वो खुद क्योंकि अंग्रेजो के सिक्योरिटी दस्ते का सदस्य रह चुका था, इसलिए बेहतर जानता था कि वो कहां चूक करते हैं और कहां लापरवाह हो जाते हैं। हथियार उसके पास था नही, इसीलिए इस काम के लिए उसने नाई वाला उस्तरा ही इस्तेमाल करने की सोची । आप सिर्फ अंदाज़ा लगा के देखिये की एक तरफ बन्दूको से लैस 12 सैनिक जो गवर्नर की रक्षा कर रहे थे और दूसरी तरफ एक अकेला आदमी जिसके पास हथियार के नाम पे सिर्फ एक उस्तरा था लेकिन शेर अली सिर्फ नाम का ही नहीं बल्कि देल से भी शेर था जेल से बाहर निकल के गवर्नर जैसे ही अपनी समुंदरी बोट के तरफ बढ़ा, उसका सिक्योरिटी दस्ता थोड़ा बेफिक्र हो गया कि चलो पूरा दिन ठीकठाक गुजर गया। वैसे भी वायसराय तक पहुंचने की हिम्मत कौन कर सकता है, जैसे कि आजके पीएम की सिक्योरिटी बेधने की कौन सोचेगा! लेकिन उनकी यही बेफिक्री उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी भूल हो गई। पोर्ट पर अंधेरा था, उस वक्त रोशनी के इंतजामात बहुत अच्छे नहीं होते थे। तभी बिजली की तरह एक साया गवर्नर की तरफ झपटा, जब तक खुद गवर्नर या सिक्योरिटी दस्ते के लोग कुछ समझते तब तक सारी बोट खून से सरोबर हो चुकी थी मौके पर ही गवर्नर की मौत हो गई हलाकि शेर अली को उसी समय ही पकड़ लिया गया, लेकिन पूरे ब्रिटिश साम्राज्य में दहशत फैल गई। लंदन तक बात पहुंची तो हर कोई स्तब्ध रह गया। जब एक गवर्नर के साथ ये हो सकता है तो कोई भी अंग्रेज हिंदुस्तान में खुद को सुरक्षित नहीं मान सकता। शेर अली अफरीदी से जमकर पूछताछ की गई, लेकिन हर सवाल के जवाब में वो एक ही बात कहते थे , “ मुझे अल्लाह ने ऐसा करने का हुक्म दिया है, मैंने अल्लाह की मर्जी पूरी की है ”। - जेल में उसकी सेल के साथियों से भी पूछताछ की गई, एक कैदी ने बताया कि शेर अली अफरीदी कहता था कि अंग्रेज देश से तभी भागेंगे जब उनके सबसे बड़े अधिकारी को मारा जाएगा और गवर्नर वायसराय ही सबसे बड़ा अंग्रेज अधिकारी था। उसकी हत्या के बाद वाकई अंग्रेज बहुत खौफ में आ गए थे । इसीलिए उन्होंने इस खबर को जायदा फैलने नही दीया और शेर अली अफरीदी को चुपचाप फांसी पर लटका दिया गया।

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